simhasthujjain

महाकवि कालिदास

भारत में संस्कृत के महान कवियों में से एक महाकवि कालिदास को माना जाता है। कालिदास के जन्म के समय के विषय में विश्वसनीय जानकारी नहीं मिलती है। विद्वानों के मत के अनुसार चौथी अथवा पाँचवीं शताब्दी के मध्य में इनका जन्म हुआ था। अनुमान है कि 150 वर्ष ईसा पूर्व से 450 ईस्वी के मध्य में कालिदास का जन्मे होंगे। इन्होंने नाट्य, महाकाव्य तथा गीतिकाव्य के क्षेत्र में अपनी अद्भुत रचनाशक्ति का प्रदर्शन कर अपनी एक अलग ही पहचान बनाई। जिस कृति के कारण कालिदास को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, वह है उनका नाटक ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम’ जिसका विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनके दूसरे नाटक ‘विक्रमोर्वशीय’ तथा ‘मालविकाग्निमित्रम’ भी उत्कृष्ट नाट्य साहित्य के उदाहरण हैं। उनके केवल दो महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ और ‘कुमारसंभवम्’ पर वे ही उनकी कीर्ति पताका फहराने के लिए पर्याप्त हैं।

व्यक्तिगत जीवन

महाकवि कलिदास ने अपनी कविताओं में सामान्यत: अलंकृत और शास्त्रीय संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया। ये अपनी अलंकार युक्त सुन्दर सरल और मधुर भाषा के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनका ऋतु वर्णन अद्वितीय हैं और उनकी उपमाएँ अतुलनीय। संगीत उनके साहित्य का प्रमुख अंग है और रस का सृजन करने में उनकी कोई उपमा नहीं। ये पाटलीपुत्र में चंद्रगुप्त के महल में वास करते थे। किवदन्तियो के अनुसार कालिदास अत्यन्त सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके व्यक्तित्व ने राजकुमारी विद्योत्तमा को उनके प्रति आकर्षित किया। लेकिन वह मूर्ख थे, यह जानते ही विद्योत्तमा ने इन्हें अस्वीकृत कर दिया।

इसके पश्चात कालिदास ने देवी काली की पूजा की और उनके आशीर्वाद से ये अत्यंत बुद्धिमान और ज्ञानी हो गये। इसके पश्चात ये चन्द्रगुप्त के नौ रत्नों में सम्मिलित हुए।

महत्वपूर्ण कार्य

अभिज्ञानशकुंतलम् : कालिदास की सबसे सुन्दर और प्रसिद्ध रचना के रूप में अभिज्ञानशकुंतलम को जाना जाता है। कालिदास की दूसरी रचना अभिज्ञानशाकुंतलम् है। कथावस्तु में राजा दुष्यन्त की कहानी है जो आश्रम में रहने वाली एक कन्या शकुन्तला से प्रेम करने लगते हैं। शकुन्तला मेनका और विश्वामित्र की बेटी हैं। विश्वामित्र की अनुपस्थिति में दुष्यन्त शकुन्तला से गन्धर्व विवाह कर निशानी के रूप में अपनी अँगूठी देकर अपने राज्य लौट जाते हैं। विश्वामित्र के वापस लौटने पर शकुंतला राजा दुष्यन्त के पास जाती हैं, तब ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण शकुन्तला की अँगूठी खो जाती है और दुष्यन्त उन्हें पहचान नहीं पाते हैं। शकुन्तला तिरस्कृत होकर कण्व ऋषि के आश्रम में चली जाती हैं। विस्तृत घटनाक्रम में एक दिन जब वह अँगूठी राजा को मिलती है तब ऋषि का श्राप टूटता है। राजा को शकुन्तला की याद आती है, वे उसको ढूँढते हैं और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगते हैं।

कालिदास ने दो और महाकाव्य ‘कुमारसंभवम्’ एवं ‘रघुवंशकाव्यम्’ की रचना की। रघुवंशम् में सम्पूर्ण रघुवंश के राजाओं की गाथाएँ हैं, तो कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।

गूगल मानचित्र

संगीत

समाचार