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राजा विक्रमादित्य

सम्राट विक्रमादित्य भारत के एक प्रसिद्ध राजा हैं। विक्रमादित्य के नाम पर एक युग है। अपने शासन काल में उन्होंने समय की गणना के लिए विक्रम संवत् आरंभ किया, जिसे आज भी उज्जैन में काल की गणना के लिए प्रयोग किया जाता है। विक्रमादित्य माँ हरसिद्धि के भक्त थे। उनकी एक मूर्ति हरसिद्धि के समीप है। विक्रमादित्य के साथ कई लोक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने माँ हरसिद्धि को प्रसन्न करने के लिए अपना शीष अर्पित कर दिया था।

विशाल सिद्धवट वृक्ष के नीचे बेताल साधना द्वारा विक्रमादित्य ने अलौकिक प्राकृतिक शक्तियाँ प्राप्त की थी। विक्रम-बेताल की चर्चित कहानियाँ उनकी इस शक्ति के विषय में समुचित प्रकाश डालती हैं। विक्रमादित्य का सिंहासन अतुलनीय शक्तियों वाला सिंहासन, जो उन्हें भगवान इन्द्र ने दिया था।

विक्रमादित्य के पश्चात यह सिंहासन लुप्त हो गया था। यह राजा भोज के शासनकाल में मिला और इस पर उन्होंने बैठने का प्रयास किया। सिंहासन में विराजमान शक्तियों ने राजा भोज की योग्यता को परखा और अंतत: उस पर बैठने की अनुमति दी। ‘सिंहासन बत्तीसी’ में इससे संबन्धित कथाएँ हैं।

भर्तृहरि और भट्टि राजा विक्रमादित्य के बड़े और छोटे भाई थे। राजपाठ छोड़कर भर्तृहरि योगी बन गये। भट्टि भी माता हरसिद्धि के भक्त थे। कहा जाता है कि भट्टी और विक्रमादित्य ने लम्बे समय तक एक वर्ष को आधा-आधा साझा करते हुए शासन किया।

उनके दरबार में “नवरत्न” कहलाने वाले नौ विद्वान थे। वे थे-1. धनवंतरी, 2. क्षपणक, 3. अमरसिंह, 4.शंकु भट्ट, 5. वेताल भट्ट, 6. घटकर्पर, 7. वाराहमिहिर, 8. वररुचि, 9. कालिदास (संस्कृत के प्रसिद्ध कवि)। रुद्रसागर में कुछ रत्न हैं, जो राजा विक्रमादित्य के सिंहासन के अवशेष कहे जाते हैं।

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