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अमृतमयी क्षिप्रा

वैदिक ऋषियों ने नदियों की वन्दना में ऋचाएँ लिखी हैं। हमारा इतिहास नदियों के प्रवाह से रचा गया इतिहास है और उनके तट हमारी परंपरा के विकास की कहानी कहते हैं। क्षिप्रा भी मानव के जीवन का पर्याय है। वह किसी पर्वत के गौमुख से नहीं, धरा गर्भ से प्रस्तुत होकर धरातल पर बहती है। इसलिए वह लोकसरिता है। इसके प्रभाव में हमारे लोकजीवन के सुख और दुःख के स्वर घुले मिले है। अपने आराध्य महाकाल का युगों से अभिषेक करते यह हमारी आस्था की केंद्र बन गयी है। हर बारह साल बाद इसके तटों पर जब आस्था का महामेला सिंहस्थ कुम्भ महापर्व के रूप में सजता है तो यह साधना,तपश्चर्या और पवित्रता के उद्घोषक के रूप में हमारे मानस को फिर जागृत करने लगती है।चर्मण्वती जिसे आज चम्बल कहा जाता है ,क्षिप्रा इसकी  सहायक नदी है। मार्केण्डेय पुराण में इन दोनों नदियों का उल्लेख आता है। स्कन्दपुराण के अनुसार क्षिप्रा उत्तरगामी है और उत्तर में बहते हुए ही चम्बल में जा मिलती है। क्षिप्रा का उल्लेख यजुर्वेद में भी है। वहाँ ‘ क्षिप्रे: अवे: पत्र: ‘ कहते हुए वैदिक ऋषियों ने क्षिप्रा का स्मरण किया है। इसका उल्लेख महाभारत ,भागवतपुराण ,ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण, शिवपुराण लिंगपुराण तथा वामनपुराण में भी है। क्षिप्रा की महिमा का संस्कृत साहित्य में खूब उल्लेख है। महाकवि कालिदास ने क्षिप्रा का काव्यमंच उल्लेख करते हुए लिखा है -’ क्षिप्रावत: प्रियतम इव प्रार्थना चाटुकार: ‘और महर्षि वशिष्ट ने क्षिप्रा स्नान को मोक्षदायक मानते हुए क्षिप्रा और महाकाल की वन्दना इन शब्दों में की है।

महाकाल श्री क्षिप्रा गतिश्चैव सुनिर्मला।
उज्जयिन्यां विशालाक्षि वास: कस्य न रोचते।।
स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महान् धामहि दुर्लभम्।
महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचते।।

Mahakal Shri Kshipra Gatishchev Sunirmala
Ujjayinya Vishalakshi Vasah Kasya Na Rochate
Snonam Kritva Naro Yastu Mahandhamahi Durlabham
Mahakal Namaskrutya Naro Mrityu Na Shochate

एक किंवदन्ति के अनुसार उज्जयिनी में अत्रि ऋषि ने तीन हज़ार साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों के ऊपर ही उठाए रखा अपनी तपस्या पूर्ण होने के बाद जब उन्होंने अपने नेत्र खोले तब देखा कि उनके शरीर से प्रकाश के दो स्रोत प्रवाहित हो रहे है-पहला आकाश की ओर गया और चन्द्रमा बन गया और दूसरे ने जमीन पर क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया। क्षिप्रा को सोमवती के नाम से भी जाना जाता है।

एक रोचक कथा यह भी है कि एक बार जब महाकालेश्वर को भूख लगी तो उसे शान्त करने के लिए उन्होंने भिक्षा माँगने का निश्चय किया। बहुत दिनों तक जब उन्हें भिक्षा नही मिली तब उन्होंने भगवान विष्णु से भिक्षा चाही। विष्णु ने उन्हें अपनी तर्जनी दिखा दी। ,इस पर शंकर ने क्रोधित होकर उस तर्जनी को त्रिशूल से भेद दिया। उस अंगुली से रक्त प्रवाहित होने लगा तब शिव ने उसके नीचे कपाल कर दिया। कपाल के भर जाने पर जब वह नीचे प्रवाहित होने लगा उसी से क्षिप्रा जन्मी।

अनेक कथाओं की जननी ऐसी क्षिप्रा ने उज्जयिनी को तीन तरफ से घेर रखा है। वह दक्षिण – पूर्वी छोर से नगर में प्रवेश करती है। फिर वह हर स्थान व मोड़ पर मनोहारी दृश्य स्थापित कर लेती है। त्रिवेणी का तट हो या चिन्तामण गणेश की ओर जाने का मार्ग ,वहाँ क्षिप्रा की सुन्दर भंगिमा के दर्शन होते हैं। महाकाल तथा हरसिद्धि के आशीर्वाद से वह अभिशक्त होती है और भगवान महाकाल के समक्ष उसकी उत्ताल तरंगें मानो नर्तन करती हैं और दुर्गादास की छत्री की ओर बढ़ते हुए वह चक्रतीर्थ पर काशी के मणिकर्णिका घाट का स्मरण कराती है, वह भर्तृहरि गुफा ,मछिन्दर, गढ़कालिका और कालभैरव क्षेत्र को पार कर सांदीपनि आश्रम और राम जनार्दन मंदिर को निहार कर मंगलनाथ पहुँचती हैं तथा इस मार्ग में वह गंगाघाट से गुजरती है। आगे बढ़कर वह सिद्धवट की ओर मुड़ती है और फिर कालियादेह महल को घेरती हैं। क्षिप्रा का यह रूप युगों से तपस्वियों को आकर्षित करते आया है और ये तट इतिहास में अमर हो गए है। क्षिप्रा के किनारे २८ प्रमुख तीर्थ है। इनमे कर्कराज ,नृसिंह तीर्थ ,पिशाचमुक्ति तीर्थ ,गन्धर्व तीर्थ ,केदार तीर्थ,सोमतीर्थ ,चक्रतीर्थ ,कालभैरव तीर्थ ,मंगल तीर्थ और शक्ति भेद तीर्थ मुख्य हैं।

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