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शाश्वत नगरी - उज्जैन

उज्जैन का संक्षिप्त परिचय

उज्जैन यानी उज्जयिनी अपने अनादि, पुरातनता, उच्च स्तरीय धार्मिक महत्व, वैदिक, पौराणिक महत्व अबूझ इतिहास सांस्कृतिक विभिन्नता, भौगोलिक स्थिति, तंत्र-मंत्र स्थल, उच्च स्तरीय शैक्षणिक केन्द्र, राजनीतिक विरासत, व्यापारिक केन्द्र, प्रधान शिक्षा केन्द्र, साहित्य में सौन्दर्यपूर्ण तथा महान ऐतिहासिक यात्रियों की रुचि का केन्द्र होने से अपने आप ही भारत की ही नहीं विश्व की सर्वाधिक पुरातन एवं रहस्यमय नगरियों में से एक कही जा सकती है।

उज्जैन की अतिविशिष्ट नगरी होने के संकेत तथा प्रतीक चिह्न, विभिन्न ग्रन्थों, शोधपत्रों, कतिपय पुरातात्विक प्रमाण मिलते हैं। रामायण तथा महाभारत काल में भी इस नगरी के अतिविशिष्ट होने के संकेत उपलब्ध हैं। सामान्य रूप में प्राप्त पुरातात्विक प्रमाणों के अनुसार ईसा पूर्व 6वीं से 7वीं शताब्दी से भी पुरातन नगरी उज्जयिनी सुस्पष्टतः सिद्ध है। इसके पूर्व उज्जैन नगरी की खोज के लिए एक विस्तृत पुरातात्विक अनुसन्धान अति आवश्यक है।

धार्मिक नगरी के रूप में उज्जयिनी को 3 भागों में विभक्त है। उत्तरीय भाग ब्रह्मा का (कालियादेह ब्रह्मकुण्ड एवं सिद्धवट), मध्यम विष्णु का (अंकपात, विष्णु सागर, पुरुषोत्तम मंदिर, वैष्णव अखाड़े), दक्षिणी भाग शिव का (महाकाल मंदिर, रुद्रसागर, शैव अखाड़े)। इस प्रकार एक नगरी में हिन्दू धर्म के तीनों देवताओं का उज्जैन नगरी को तीन हिस्सों के रूप में विभक्त करके प्रतिष्ठित होना अपने आप में अनूठा, अभूतपूर्व तथा रोमांचक है।

सनातन (हिन्दू धर्म) में 5 देव ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश तथा शक्ति प्रमुख होकर ‘पंचदेव’ के रूप में विख्यात हैं। उज्जैन के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) की प्रतिष्ठा ऊपर वर्णित है। शक्ति-हरसिद्धि, गढ़कालिका, नगरकोट की महारानी तथा विभिन्न मातृकाओं के रूप में उज्जैन में विराजित हैं तथा सीताजी द्वारा स्थापित षष्ठ गणेश-चिंतामण, मंछामन, स्थिरमन, अविघ्नविनायक, तथा महाकाल मन्दिर में स्थापित गणेश एवं इसके अलावा चक्रतीर्थ, श्मशान में स्थित गणेश मन्दिर स्वयं ही उज्जैन में गणेशजी की विशिष्ट आराधना को दर्शाता है।
उक्त से स्पष्ट है कि सनातन धर्म के प्रमुख 5 देवताओं के विराजित होने के साथ ही पूजा की जीवन्त परम्परा से भी ‘‘उज्जयिनी’’ सनातन धर्म एवं भारत का परिपूर्ण तथा उच्चतम तीर्थ स्थल है।

सूर्य मन्दिर कालियादेह में स्थित है जिसके बार में कहा जाता है कि यहाँ कभी बड़ा सूर्य मंदिर था इसके अलावा पुरातन प्रमाण कायथा में भी सूर्यमूर्ति तथा पूजा के साथ ही सूर्य पूजक वराहमिहिर वंशज ब्रह्माणों से मिलते हैं। इस प्रकार सूर्यदेव की प्रतिष्ठा भी उज्जैन में पुरातन समय से स्वयं सिद्ध रही है। इस प्रकार उज्जैन पुरातन आर्य धार्मिक परम्परा का भी वाहक सिद्ध होता है।

उज्जैन का भारतीय धार्मिक साहित्य में मात्र भारत अथवा पृथ्वी ही नहीं अन्तरिक्ष का ‘‘अक्षकेन्द्र’’ भी मान्य किये जाने के संकेत किये गये हैं।

आकाशे तारकंलिंगं, पाताले हाटेकेश्वरम ।
मृत्युलोके महाकालं, त्रय लिंगं नमोस्तुते।।

श्लोक कुछ इसी ओर इंगित करता है। इस बात में कोई दो मत नहीं है कि पुरातन भारतीय महर्षि याने ऋषिमुनि योग, ध्यान आदि प्रक्रियाओं से अपने सूक्ष्म मस्तिष्क को असामान्य रूप से जाग्रत करते थे। जिसे कुण्डलिनी जागरण भी कहा जा सकता है। इस प्रकार अपनी असीमित मानसिक शक्तियों से विशाल अन्तरिक्ष के गूढ़ अन्तरिक्ष रहस्यों को पढ़ने की क्षमता इन महर्षियों में थी। अपनी इस अद्भुत मस्तिष्कीय क्षमता के आधार पर ही अंतरिक्ष एवं सौरमण्डलीय परिक्षेत्रों को राशि, नक्षत्र, आकाशगंगा आदि भागों में सुस्पष्ट रूप से विभक्त करने में हमारे महर्षि सफल हुए। इन सभी ने मिलकर उज्जैन को कालगणना का केन्द्र भी निर्धारित किया। सामान्य काल गणना ही नहीं पृथ्वी के बार-बार प्रलय में समाहित होकर पुनः प्रकट होने को काल गणना केन्द्र इस उज्जयिनी नगरी को मान्य किया जाता है। वर्तमान में 84 महादेव, 84 कल्प, यानी पृथ्वी के पुनः जल प्रलय के उपरान्त प्रकटः होने से समय को निर्धारित करते हैं। यह भी मान्यता है कि जल प्रलय पर उज्जयिनी प्रभावित नहीं होती यानी डूबती नहीं है। महाकाल मंदिर में स्थापित ‘‘अनादिकल्पेश्वर-शिवलिंग’’ इस सन्दर्भ के प्रतीक चिह्न मान्य किये जाते हैं। स्कन्दपुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि ‘‘कालचक्र प्रवर्तकों महाकालः प्रतापणः’’

पुरातन भारतीय संवत् ‘विक्रम संवत्’ का प्रादुर्भाव भी उज्जैन से ही हुआ है। इसके साथ ही उज्जैन की भौगोलिक स्थिति पूर्व में देश का नाभि क्षेत्र उज्जैन को मान्य किया जाता रहा है। नाभिदेशे महाकालस्तन्नाम्ना तत्र वै हरः। वर्तमान में मनीषी नोबल पुरस्कार प्राप्त विजेता अर्थात् अमर्त्य सेन का सुस्पष्ट कहना है कि ग्रीनविच के स्थान पर उज्जैन को समय की गणना स्थल रखा जाना चाहिए। राजा जयसिंह द्वारा 4 स्थलों वेधशाला में से एक का निर्माण भी उज्जैन में इसके भौगोलिक महत्व को ध्यान में रखते हुए कराया गया था।
उज्जैन में ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) की मात्र स्थापना है ही इसके साथ ही अपितु इन स्थापना के साथ ब्रह्मा विष्णु एवं शिव के सर्वाधिक प्रिय स्थलों के रूप में इस नगरी का वर्णन पुराणों में आता है।

ब्रह्मा, विष्णु महेश के अलावा सप्तर्षियों एवं अन्य मनीषियों का उज्जैन से सम्बन्ध होना उज्जैन को अन्य तीर्थ स्थलों से विशेष सिद्ध करता है। गयाकोठा में स्थित सप्तऋषि मंदिर सह ऋषि मंदिर-महाकाल मंदिर में सप्तऋषियों के मन्दिरों का होना ही उज्जैन की विशेषता दर्शाता ही है इसके साथ ही श्राद्ध एवं तर्पण हेतु 3 प्रमुख स्थल सिद्धनाथ, गयाकोठा तथा रामघाट पर पिण्डदान की पुरानी परम्परा अपने आप में उज्जैन को अदभुत स्थल सिद्ध करती है। गयाकोठा में श्राद्ध तथा तर्पण के महत्व को ध्यान में रखते हुए वर्तमान काल में भी देश एवं विदेश से हजारों श्रद्धालु श्राद्ध पक्ष में गयाकोठा उज्जैन में अपने पुरखों के श्राद्ध एवं तर्पण के हजारों की संख्या में आते हैं। पुरातन समय से सिद्धनाथ पर श्रद्धालुओं के कुल एवं पते के साथ आगमन का इतिहास लिखा जाना तथा स्वयं उज्जैन के प्राचीन महत्व को सिद्ध करता है।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल, 52 शक्तिपीठों में से एक हरसिद्धि, सप्तपुरियों में से एक अवन्तिका, पुरातन 4 प्रमुख कुंभ स्थलों में से एक उज्जयिनी, 12 शक्तियों में से 1 गढ़कालिका, 9 नारायणों का स्थल, षष्ठ गणेश का स्थल, मातृकाओं का स्थल, भैरव स्थल, श्मशान स्थल, वल्लभाचार्य जी की बैठक, पाशुपत सम्प्रदाय की प्रमुख स्थली, नाथ सम्प्रदाय के सर्वोच्च गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की कर्मस्थली होने से उज्जैन के धार्मिक महत्व का वर्णन शब्दों की सीमा में बाँधना लगभग असम्भव ही है।

भारत की सर्वाधिक पवित्र नदियों में से एक ‘‘शिप्रा-मालवांचल की गंगा’’ का ‘‘उत्तर वाहिनी’’ अंश तीर्थों में सर्वोच्च स्तर पर उज्जयिनी को ले जाता है। शिप्रा सर्वत्र पुण्याऽऽस्ते ब्रह्महत्यापहारिणी एवं – क्षिप्रादेवनामपि दुर्लभा। नीलगंगा, गन्धवती नदी, चन्द्रभागा (सोमवती), क्षाता जैसी प्राचीन पवित्र नदियों से पोषित यह क्षिप्रा माँ, धार्मिक पवित्रता की ऊँचाइयों को छूती है। क्षिप्रा की महत्ता विष्णु से उत्पन्न होने की मान्यता के कारण विष्णुद्यवा, वराहावतार से उत्पन्न वराहतनया, कामधेनु से उत्पन्न-कामधेनुसमुद्यवा, विष्णु एवं शिव की सर्वोच्च शक्ति यानी चक्र और पाशुपत की शक्ति से उत्पन्न पीड़ा (ज्वर) को समाप्त करने की क्षमता के कारण ज्वरघ्नी के साथ ही नागलोक में शिप्रा जल को कुण्डों में भरने के उपरान्त उन कुण्डों का अमृत से पुनः भर जाना तथा क्षिप्रा का अमृतोद्यवा नामकरण होना अपने आप में क्षिप्रा की सर्वोच्च महत्ता को दर्शाता है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से उज्जैन का महत्व अपनी भौगोलिक स्थिति तथा धार्मिक उच्चता से स्वयं सिद्ध सौरमण्डलीय ग्रहों में से ज्योतिष दृष्टिकोण सर्वाधिक महत्व प्राप्त ग्रहों के स्थान उज्जैन में सुनिश्चित प्रतीत होते हैं:-

  •  सूर्य-कालियादेह स्थित सूर्य मन्दिर
  • चन्द्रमा-सोमतीर्थ
  • मंगलनाथ मन्दिर
  • गुरु (बृहस्पति) – प्राचीन बृहस्पति मंदिर गोलामंडी
  • शनि नवग्रह मंदिर – त्रिवेणी
  • राहू – कालभैरव

बुध, शुक्र एवं केतु मात्र के स्थल यहाँ सुस्पष्ट नहीं है। कतिपय स्थलों पर विद्वानों का मत है कि पूर्व में समस्त नवग्रहों के पूजा स्थल भी उज्जैन में स्थित रहे हैं। त्रिवेणी स्थित शनि नवग्रह मंदिर में समस्त नवग्रह ग्रह स्थापित भी हैं। वर्तमान समस्त नवग्रहों के स्थल उज्जैन में उपलब्ध भले न हो परन्तु सप्ताह के प्रत्येक वार के दर्शन हेतु यहाँ स्पष्ट स्थल निर्दिष्ट है।

  • सोमवार – महाकाल
  • मंगलवार – मंगलनाथ
  • बुधवार – चिन्तामण गणेश
  • गुरुवार – गुरु/बृहस्पति मन्दिर
  • शुक्रवार – गजलक्ष्मी या संतोषी माता मन्दिर
  • शनिवार – त्रिवेणी/अनन्त पेठ/ढाबा रोड स्थित शनि मन्दिर
  • रविवार – सूर्य मन्दिर/कालियादेह या कालभैरव दर्शन

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से नाभिक्षेत्र एवं शिव नगरी होने से गृहीय समस्या एवं कुण्डली में स्थित दुर्योगों से होने वाली समस्याओं संबंधी उपायों का श्रेष्ठ केन्द्र उज्जैन को माना जाता है। उज्जैन को फलित ज्योतिष के अन्तर्गत मंगल दोष, पितृ दोष तथा कालसर्प दोष एवं अन्य कई दोषों का निवारण का प्रमुख स्थल मान्य किये जाने के साथ ही उज्जैन में इन दोषों के निवारण स्थल पर निर्धारित किया जाना प्रतीत होता है।

तंत्र-मंत्र के दृष्टिकोंण में उज्जैन को सुदूरपूर्व स्थित बंगाल याने दक्षिणेश्वरी महाकाली कलकत्तावासिनी एवं कामाख्या देवी गोहाटी के समकक्ष ही सम्पूर्ण भारतवर्ष में मान्यता प्राप्त है। तंत्र-मंत्र सिद्धि के सम्बन्ध में महाकाल का अपने कपाल पत्र को उज्जयिनी में फेंकना, स्वयं देवी की कोहनी गिरकर शक्तिपीठ प्रसिद्ध होकर ‘‘हरसिद्धि’’ नाम धारण कर सर्वसिद्धिदायक के रूप में विख्यात होना ही उज्जैन को तांत्रिक केन्द्र के रूप में स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। गढ़कालिका, भूखीमाता, चौसठ योगिनी, पाताल भैरवी, महालाया-महामाया का मातृकाओं के रूप में उज्जैन में स्थित होना, कालभैरव, अर्द्धकालभैरव, विक्रान्तभैरव का उज्जैन में स्थान होना, पाशुपत सम्प्रदाय के लकुलिश द्वारा स्थापना, नाथ सम्प्रदाय का प्रादुर्भाव, मत्स्येन्द्रनाथ की समाधि तथा भर्तृहरि की गुफाएँ, तंत्र मंत्र के सम्बन्ध में उज्जैन को पूरे आर्यावर्त में एक उच्च स्थल पर पदस्थ करते हैं। भूखी माता, हरसिद्धि, महामाया, महालाया आदि देवियों को बलि देने का बार-बार उल्लेख मिलता रहता है। वर्तमान में कालभैरव को सुरापान या शासन की ‘‘सुराधार’’ से नगर पूजा उज्जैन के तांत्रिक पीठ होने को सिद्ध करते हैं।

नृसिंह घाट, चक्रतीर्थ, ओखलेश्वर तथा विक्रान्त भैरव तथा मत्स्येन्द्रनाथ की समाधि पर कलकत्ता एवं आसपास से आये तांत्रिकगणों को मिलना भी आम बात है। तान्त्रिकों द्वारा बताया जाता है कि कलकत्ता एवं असम की कामाख्या देवी मंदिर में तांत्रिकी सिद्धि प्राप्त करने के उपरान्त उज्जैन में आकर एवं कतिपय तांत्रिक क्रियाओं को करने के उपरान्त ही सिद्धि की पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। इस पूर्णता का शिव के ‘‘अर्द्धनारीश्वर’’ रूप में समझा जा सकता है। कलकत्ता एवं गौहाटी आदि शक्ति के स्थल है तथा उज्जयिनी कापालिक महाकाल तांत्रिक का स्थल हैं। अतः जब तक तांत्रिक क्रियाओं में दोनों का संयुक्तिकरण नहीं होगा तब तक तांत्रिक पूर्णता भी अप्राप्त रहेगी। वर्तमान में भी विश्वप्रसिद्ध डबराल बाबा तथा अन्य कुछ तांत्रिकी विद्याओं को जानने वाले महानुभव उज्जैन में मिल जाते हैं।

कृष्ण के द्वारा मथुरा से उज्जैन आकर 14 विद्याएँ 64 कलाओं का ज्ञान गुरु सान्दीपनि से प्राप्त करना स्वयं उज्जैन के शैक्षणिक वैभव एवं महान ज्ञान केन्द्र को दर्शाता है। 12वीं शताब्दी के पूर्व एक बड़े विश्वविद्यालय का उज्जैन नगर में होना पाया जाता है। राजा भोज स्वयं के साथ ही वराहमिहिर, वात्स्यायन आदि विद्वानों द्वारा विभिन्न शास्त्रों की रचना एवं टीका उज्जैन को अपने आप में देश के सतत सर्वोच्च शैक्षणिक केन्द्र में पदस्थ करती है। विभिन्न ग्रन्थों एवं किताबों को पढ़ने से यह संकेत प्राप्त होते हैं कि वास्तुशास्त्र, काव्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र, व्याकरण, गणित, रसायनशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र आदि में से कई शास्त्रों का वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुतीकरण या उद्भव केन्द्र प्राचीन उज्जैन को माना जा सकता है। यह शोध का विषय भी है। यह मान्यता भी है कि शून्य का आविष्कार उज्जैन में ही हुआ है और शून्य के आविष्कार से अनन्त संख्या की कल्पना भी उज्जैन में मान्य की जाती है।

बेताल पच्चीसी तथा सिंहासन बत्तीसी की कथाएँ उज्जैन को रहस्यमयी तान्त्रिक-मान्त्रिकी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गहन विषयक निरूपित करती हैं।

उज्जैन कैसे पहुँचें

travels उज्जैन भारत में क्षिप्रा नदी के किनारे बसा मध्य प्रदेश का एक प्रमुख धार्मिक नगर है।

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