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सिंहस्थ कुम्भ महापर्व

सिंहस्थ कुम्भ महापर्व उज्जैन का महान धार्मिक पर्व है। बारह वर्षों के अन्तराल से यह पर्व तब मनाया जाता है जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित रहता है। पवित्र क्षिप्रा नदी में पुण्य स्नान की विधियाँ चैत्र मास की पूर्णिमा से प्रारम्भ होती है और पूरे मास में वैशाख पूर्णिमा के अन्तिम स्नान तक विभिन्न तिथियों में संपन्न होती है। उज्जैन के इस महापर्व के लिए पारम्परिक रूप से दस योग महत्वपूर्ण माने गये हैं।

उज्जैन में आयोजित होने वाले इस भव्य समारोह के लिए विभिन्न पारम्परिक कारक ढूँढे जा सकते हैं। पुराणों के अनुसार देवों और दानवों के सहयोग से सम्पन्न समुद्रमन्थन से अन्य वस्तुओं के अलावा अमृत से भरा हुआ एक कुम्भ (घड़ा) भी निकला था।

देवता दानवों के साथ अमृत नहीं बाँटना चाहते थे। देवराज इन्द्र के संकेत पर उनके पुत्र जयन्त ने अमृत कुम्भ लेकर भागने की चेष्ठा की, तो ऐसे में स्वाभाविक रूप से दानवों ने उनका पीछा किया। अमृत-कुम्भ के लिए स्वर्ग में बारह दिन तक संघर्ष चलता रहा और परिणामस्वरूप हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में अमृत की कुछ बूँदें गिर गयीं। यहाँ की पवित्र नदियों को अमृत की बूँदें प्राप्त हुईं। अमृत कुम्भ के लिए स्वर्ग में बारह दिनों तक संघर्ष हुआ, जो धरती पर बारह वर्ष के बराबर है। अन्य तीन स्थानों पर यह पर्व कुम्भ के नाम से अधिक लोकप्रिय है। सभी चार स्थानों के लिए बारह वर्ष का यह चक्र समान है।

  • समुद्र मन्थन

    सिंहस्थ कुम्भ महापर्व एक विशाल आध्यात्मिक आयोजन है, जो मानवता के लिए जाना जाता है। इसके नाम की उत्पत्ति ‘अमरत्व का पात्र’ से हुई है। पौराणिक कथाओं में इसे ‘अमृत कुण्ड’ के रूप में जाना जाता है।

    भागवत पुराण, विष्णु पुराण, महाभारत और रामायण आदि महान ग्रन्थों में भी अमृत कुंड और अमृत कलश का उल्लेख मिलता है। ऐसा माना जाता है कि देवता और असुरों द्वारा किये गये ‘समुद्र मंथन’ से अमृत कलश की प्राप्ति हुई थी। इस कलश को प्राप्त करने के लिए असुर और देवताओं में 12 दिनों तक संघर्ष हुआ था। अमृत कलश को  असुरों से सुरक्षित रखने के लिए  देवराज इन्द्र के सुपुत्र जयंत युद्ध के मैदान से लेकर भागे।

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  • ज्योतिषीय महत्व

    कुम्भ मेला हरिद्वार, इलाहाबाद (प्रयाग), नासिक और उज्जैन में बारह वर्षों के अन्तराल से मनाया जाता है। इनमें से सभी स्थानों पर आयोजित होने वाले कुम्भ मेले को विभिन्न राशियों में सूर्य और बृहस्पति की स्थितियाँ निर्धारित करती हैं।

    हरिद्वार में यह तब आयोजित होता है, जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुम्भ राशि में हो।

    इलाहाबाद (प्रयाग) में यह तब आयोजित होता है, जब सूर्य मकर राशि और बृहस्पति वृष राशि में हो। यह नासिक में तब आयोजित होता है, जब बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करता है। इसके अलावा जब अमावस्या पर कर्क राशि में सूर्य और चन्द्रमा प्रवेश करते हैं, उस समय भी नासिक में कुम्भ का आयोजन होता है।

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  • सिंहस्थ कुम्भ महापर्व 2016

    प्राचीन भारत में आध्यात्मिक सत्यों को सांकेतिक कथाओं के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता था कालान्तर मे यही कथाएँ विभिन्न परम्पराओं की जनक सिद्ध हुई और हमारी रहस्यमयी, विविधरंगी संस्कृति ने आकार ग्रहण किया। इसलिए यह सम्भव नहीं था कि कुम्भ जैसे आयोजनों के पीछे कोई कथा न हो। पुराणों में इसकी कथा है। चाहे आज इस कथा के पीछे के सत्य की कोई छाया भी हमारी स्मृति में शेष न हो, लेकिन कथा तो है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में हिमालय के समीप क्षीरोद नामक समुद्र तट पर देवताओं तथा दानवों ने एकत्र होकर फल प्राप्ति के लिए समुद्र-मन्थन किया। फलस्वरूप जो 14 रत्न प्राप्त हुए । उनमें श्री रम्भा, विष, वारुणी, अमिय, शंख, गजराज, धन्वन्तरि, धनु, तरु, चन्द्रमा, मणि और बाजि । इनमें से अमृत का कुम्भ अर्थात घड़ा सबसे अन्त में निकला।

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उज्जैन में भविष्य में आयोजित सिंहस्थ कुम्भ महापर्व पर्वो की विक्रम संवत्,शक संवत तथा एवं अंग्रेजी सन को दर्शातं हुए तालिका

क्र. विक्रम संवत शक संवत ऐ. डी./सन
1 2073 1939 2016
2 2085 1951 2028

आगामी सिंहस्थ कुम्भ महापर्व में होने वाले योग

शिव विंशति: – शिव की बीसी।
सोमयोग 5 वर्ष – चन्द्रमा का युग
संवत्सरः- सौम्यवर्ष-जिसके देवता बुध हैं।

उज्जैन कैसे पहुँचें

travels उज्जैन भारत में क्षिप्रा नदी के किनारे बसा मध्य प्रदेश का एक प्रमुख धार्मिक नगर है।

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